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सैन्य बलों का स्वाभिमान और हमारी भूमिका

Posted On: 19 Apr, 2017 में

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इस समय देश भर में कश्मीर से आये कुछ वीडियोज की जोर-शोर से चर्चा हो रही है। जिनमें से एक वीडियो में चुनाव ड्यूटी से लौटते समय सीआरपीएफ के जवानों को कश्मीरी युवकों द्वारा अपमानित करते हुए दिखाया जा रहा है। उनके समक्ष भारत विरोधी नारे लगाए जा रहे हैं। एक जवान को कश्मीरी युवकों के द्वारा लात, घूसों से पीटा जा रहा है और वह जवान अपने पास शस्त्र होते हुए भी इस तरह के स्वयं के साथ हो रहे अपमान को सहन कर रहा है। इस वीडियो से पहले भी कई सारे सेना विरोधी व सेना को अपमानित करने वाले वीडियों देखे जा चुके हैं। इस वीडियो को देखकर सभी देशवासी गुस्से में हैं केवल छद्म धर्मनिरपेक्षवादियों, तथाकथित राजनीतिज्ञों, अलगाववादियों, वामपंथियों आदि को छोड़कर।
इन्ही सब के बीच कश्मीर का एक और वीडियो सामने आया है जिसमें सेना के जवानों ने एक पत्थरबाज अपनी जीप के आगे बांधकर स्वयं के व वहां के नागरिकों के बचाव के लिए कुछ दूर घुमाकर सुरक्षित छोड़ दिया। इस पर देश के तमाम आतंकी प्रेमी, अलगाववादी, व पत्थरबाज प्रेमी आदि सेना पर सवाल उठा रहें हैं व उसकी कड़ी निंदा कर रहे हैं। जम्मू-कश्मीर की पीडीपी-बीजेपी सरकार ने सेना के इस कृत्य पर एफआईआर दर्ज कर ली है।
कश्मीर में पिछले कुछ समय से पत्थरबाजी की घटनाएँ आम हैं, जो पाक प्रायोजित व अलगाववादियों, आतंकियों द्वारा वहां के नागरिकों को रुपये देकर उन्हें सेना के खिलाफ पत्थरबाजी के लिए उकसाते हैं व आतंकियों के विरूद्ध चलाए जाने वाले आपरेशन में बाधा डालने का काम करते हैं। गृह मंत्रालय के लोकसभा में लिखित बयान के मुताबिक अप्रैल 2016 में 97, मई व जून में 32 व 66 बार पत्थरबाजी हुई। 8 जुलाई 2016 को बुरहानवानी के एनकाउंटर के बाद पत्थरबाजी की घटनाएं जुलाई में बढ़कर 142 हो गई। जुलाई से नवंबर तक 837 बार पत्थरबाजी हुई। नवंबर 2016 में 73 बार व दिसंबर 2016 व जनवरी 2017 में 36 व 17 बार पत्थरबाजी हुई।
पिछले कुछ दिनों से पत्थरबाजी की घटनाएं की पूर्व की अपेक्षा काफी मात्रा में बढ़ गयी हैं। अब वहां के न सिर्फ युवक पत्थरबाजी कर रहें हैं अपितु युवतियां भी व स्कूल के छात्र-छात्राएं भी पत्थरबाजी कर रहे हैं। बुरहानवानी एनकाउंटर के बाद हुई पत्थरबाजी में लगभग 2580 सेना के जवान घायल हुए थे। कुछ दिनों पहले उपद्रवियों ने जीपसहित पुलिसकर्मियों को नदी में फेंक दिया था। पिछले माह बड़गाम में आतंकी आपरेशन के दौरान कश्मीरी नागरिकों द्वारा की गई पत्थरबाजी में लगभग 55 सेना के जवान व स्थानीय पुलिस के 20 जवान घायल हुए थे।
वैसे तो जब देश में सेना पत्थरबाजों के खिलाफ कारवाई करती है तो देश के तमाम बद्धिजीवी, पत्रकार, राजनीतिज्ञ आदि मानवाधिकार की दुहाई सेना के कदमों का विरोध शुरू कर देते हैं, लेकिन पत्थरबाजों के कृत्यों पर यही लोग मौन साध लेते हैं। सेना के लिए इन लोगों का दोगला चरित्र क्यों है? पत्थरबाजों व आतंकियों के मानवाधिकार की बात करने वाले लोग देश के सैनिकों के मानवाधिकार की बात क्यों नहीं करते? देश के सैनिकों का अपमान उन्हें क्यों नहीं दिखता? पत्थरबाजों व आतंकियों के परिवार के विषय में सोचने वाले लोग सैनिकों के परिवार व उनके आश्रितों के विषय में क्यों नहीं सोचते? हम सेना की पीठ थपथपाते हैं लेकिन उनके अधिकारों की बात से पीछे क्यों हट जाते हैं? देश की सरकार सर्जिकल स्ट्राइक का श्रेय लेती है लेकिन उनके अपमान पर व पत्थरबाजों द्वारा हमला किये जाने पर श्रेय क्यों नहीं लेती? अंतर्राष्ट्रीय कानूनों, संधियों, समझौतों के अनुसार युद्ध अनिवार्य अंग नहीं है लेकिन देश के अंदर उत्पात मचाते लोगों पर नियंत्रण न करना किस कानून के अंतर्गत है? सेना पर, सैनिकों पर पत्थरबाजी करने वाले लोगों से निपटने में कौन सा समझौता आड़े आ रहा है? कश्मीरी युवक मानवाधिकार की हनक की चलते साफ-साफ बच निकलें, ऐसा किस नियम में लिखा हुआ है? क्या विकास की बात करने से कश्मीर की पत्थरबाजी का अंत हो जाएगा? क्या कश्मीरी युवकों को सेना में भर्ती कर लेने वहां के नागरिकों का सेना के प्रति रवैया व सोच बदल जाएगी? क्या गोली खाने, पत्थर खाने वाले, शरीर जला देने वाले पेट्रोल बमों की तपिश झेलने वाले जवानों के कोई अधिकार नहीं है? क्या देश में सेना के लिए कोई न्याय नहीं है? देश के सैनिकों का इस तरह अपमान कब तक होगा?
इस तरह के सवाल लगभग हर देशवासी के जेहन में है, जिनका समाधान बहुत जरूरी है। देश की सरकार को इजराइल जैसे छोटे से देश से सीखना चाहिए, जिसने 2015 में पत्थरबाजों को लेकर अपने देश के सिविल लॉ में एक बड़ा बदलाव किया था। जिसके तहत वहां के सैनिकों, नागरिकों व गाड़ियों पर हमला करने वालों के लिए कम से कम 3 साल की जेल की सजा का प्रावधान रखा गया था। इजराइल के सांसदों में 51 ने वहां के क्रिमिनल लॉ के बदलाव के पक्ष में व 17 ने विपक्ष में वोटिंग की थी। इस कानून की मदद से वहां की सरकार पत्थरबाजों के सारे अधिकार छीन सकती है व उनके माता-पिता का नेशनल हेल्थ इंश्योरेंस व उन्हें मिलने वाली सुविधाएँ रद्द की जा सकती हैं। भारत को भी पत्थरबाजों से निपटने के लिए कड़े से कड़ा कानून बनाना चाहिए व देश के सांसदों को सेना के लिए एकजुट होना चाहिए और पत्थरबाजों के लिए कड़ी से कड़ी सजा का प्रावधान करना चाहिए। घारा 370 को खत्म करना चाहिए। अलगाववादियों व पाकिस्तान परस्त नेताओं की सारी सुविधाओं को खत्म कर देना चाहिए। देश की सैनिकों का मनोबल बढ़ाना चाहिए और हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि हर तरह की आपदा-विपदा में देश की जवान बिना किसी भेदभाव के हमारी मदद करते हैं और यदि वे गोली खाते हैं, पत्थर खाते हैं और अपमानित होते हैं तो सिर्फ और सिर्फ हमारे लिए ताकि हम देश में आराम की जिंदगी जी सकें। हमें देश के सैनिकों के लिए हमेशा खड़े होना चाहिए।

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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
April 20, 2017

प्रिय तीर्थ जी बहुत सुंदर कई प्रश्न उठाता लेख

TIRTH RAJ SINGH के द्वारा
June 10, 2017

आपका बहुत बहुत हार्दिक आभार क्षमाप्रार्थी हूँ जो आपकी टिप्पणी मैंने बहुत ही विलम्ब से देखी

TIRTH RAJ SINGH के द्वारा
June 10, 2017

आपका आभार माँ जी प्रणाम आपको।


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